मंदसौर में ‘करोड़ों’ का दोमुंहा सांप बरामद: आखिर क्यों होता है ये सांप इतना मंहगा
मंदसौर:मध्य प्रदेश के मंदसौर में वन विभाग की टीम ने वन्यजीव तस्करी के एक बड़े अंतरराष्ट्रीय रैकेट का पर्दाफाश किया है। यह रैकेट किसी सोने-चांदी या ड्रग्स की नहीं, बल्कि एक जीते-जागते दुर्लभ जीव की तस्करी कर रहा था, जिसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय काले बाजार में करोड़ों में आंकी जाती है। हम बात कर रहे हैं ‘रेड सेंड बोआ’ (Red Sand Boa) की, जिसे आम बोलचाल में ‘दो मुहा सांप’ भी कहा जाता है।
मुखबिर की सूचना और हवाई पट्टी के पास का ‘सस्पेंस’
इस पूरे ऑपरेशन की स्क्रिप्ट किसी फिल्मी सीन की तरह लिखी गई थी। वन विभाग को एक सटीक मुखबिर से सूचना मिली थी कि मंदसौर में दुर्लभ प्रजाति के सांप ‘रेड सेंड बोआ’ की खरीद-फरोख्त होने वाली है। मुखबिर ने तस्करों का हुलिया और लोकेशन भी बता दी थी।
सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम एक्शन में आ गई। लोकेशन थी- हवाई पट्टी भालोट रोड के पास का एक सुनसान खेत। टीम ने बिना समय गंवाए इलाके की घेराबंदी शुरू कर दी। खेत में उन्हें मुखबिर के बताए हुलिए के अनुसार कुछ संदिग्ध व्यक्ति दिखाई दिए। जैसे ही टीम ने उन्हें चारों तरफ से घेरा, तस्करों में हड़कंप मच गया।
थैले में बंद था ‘खजाना’, एक तस्कर फरार
वन विभाग की टीम ने मौके पर मौजूद दो लोगों को दबोच लिया। उनके पास मौजूद एक थैले की तलाशी ली गई, तो उसके अंदर वह दुर्लभ ‘रेड सेंड बोआ’ सांप बरामद हुआ, जिसे वे बेचने की फिराक में थे।
पकड़े गए आरोपियों की पहचान बद्रीलाल (निवासी जेठाना, जिला रतलाम) और नवीन जैन (निवासी खानपुरा, जिला मंदसौर) के रूप में हुई। हालांकि, इस अफरातफरी का फायदा उठाकर उनका एक साथी, वरसिंह, मौके से भागने में कामयाब हो गया। टीम ने मौके से तस्करों की एक प्लैटिना मोटरसाइकिल भी जब्त की है।
रतलाम से नीमच तक जुड़े तार

गिरफ्तार किए गए बद्रीलाल और नवीन से जब वन विभाग ने कड़ाई से पूछताछ की, तो उन्होंने तस्करी के इस नेटवर्क के एक और अहम किरदार का नाम उगला। उनकी निशानदेही पर वन विभाग की टीम ने तुरंत नीमच में दबिश दी और वहां से तीसरे आरोपी कौसर बेग (निवासी रिसाला मस्जिद, नीमच) को गिरफ्तार कर लिया।

आखिर क्यों है ‘रेड सेंड बोआ’ इतना महंगा?
रेड सेंड बोआ (वैज्ञानिक नाम: Eryx johnii) की तस्करी के पीछे सिर्फ और सिर्फ अंधविश्वास और लालच का खेल है।
- ‘दो मुहा’ होने का भ्रम: यह सांप बेहद शांत स्वभाव का और गैर-विषैला होता है। इसकी पूंछ भी इसके मुंह की तरह ही गोल और मोटी होती है। इस कारण यह भ्रम पैदा होता है कि इसके दो मुंह हैं। इसी बनावट के कारण इसे ‘दो मुहा सांप’ कहा जाता है।
- गड़ा धन और तांत्रिक क्रियाएं: काले बाजार में इसकी मुंह मांगी कीमत मिलने का सबसे बड़ा कारण अंधविश्वास है। ऐसी भ्रामक मान्यताएं फैला दी गई हैं कि इस सांप का इस्तेमाल तांत्रिक क्रियाओं में करके गड़े हुए खजाने (hidden treasure) का पता लगाया जा सकता है। कुछ लोग इसे रातोंरात अमीर बनाने वाला ‘जादुई जीव’ मानते हैं।
- फर्जी औषधीय गुण: अंतरराष्ट्रीय बाजार, खासकर चीन और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में, यह अंधविश्वास भी प्रचलित है कि इस सांप के मांस में पौरुष शक्ति बढ़ाने वाले या असाध्य रोगों को ठीक करने वाले औषधीय गुण होते हैं, जबकि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।
इन्हीं झूठी मान्यताओं के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत लाखों से लेकर करोड़ों रुपये तक लगा दी जाती है, जिससे तस्कर इस बेजुबान जीव के पीछे पड़े रहते हैं।
कानून का शिकंजा: बाघ के बराबर है दर्जा
वन विभाग ने इन तस्करों के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत वन अपराध प्रकरण क्रमांक 3832/11 दर्ज किया है। यह सांप कानून की अनुसूची 1 के भाग C में संरक्षित है—यानी इसे वही सुरक्षा प्राप्त है जो बाघ या मोर को हासिल है। इसकी तस्करी एक गैर-जमानती अपराध है, जिसमें 3 से 7 साल तक की जेल और कम से कम 25 हजार रुपये के जुर्माने का प्रावधान है।
मामले में विवेचना जारी है और फरार आरोपी वरसिंह की तलाश की जा रही है। पकड़े गए तीनों आरोपियों को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी मंदसौर द्वारा 20 जनवरी 2026 तक न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया है। वहीं, बरामद किए गए दुर्लभ सांप को न्यायालय की अनुमति के बाद उसके प्राकृतिक आवास (जंगल) में सुरक्षित छोड़ दिया गया है।

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