West Bengal Election 2026 पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने बंपर जीत के साथ सत्ता में दमदार दस्तक दे दी है। 208 सीटों पर विजय की कल्पना शायद ही किसी ने की होगी। चुनाव से पहले पूरा मामला 50-50 का माना जा रहा था, ऐसा लग रहा था कि कांटे की टक्कर होगी, लेकिन मुकाबला इतना एकतरफा हो जाएगा, यह किसी ने नहीं सोचा था। खैर, बीजेपी अब इस सूबे में अपना कमल पूरी तरह खिला चुकी है।
अब जबकि नई सरकार सत्ता संभालने जा रही है, तो मेरे ख्याल से उन्हें सबसे पहले एक बेहद जरूरी और व्यावहारिक काम करना चाहिए। वो काम है—राज्य के नाम को दुरुस्त करना। ज़रा सोचिए, जब पूर्व में कोई बंगाल है ही नहीं (जो था वो तो बरसों पहले एक अलग देश बन गया), तो फिर भारत में जो इकलौता बंगाल है, उसे आज भी ‘पश्चिम बंगाल’ या ‘WEST BANGAL’ क्यों बोला जाए? इसे सीधे और साफ तौर पर सिर्फ ‘BANGAL’ कहा जाना चाहिए।

प्रक्रिया भी बहुत सीधी है।
प. बंगाल की नई विधानसभा केन्द्र सरकार के पास भेजे प्रस्ताव।
नई सरकार को अपनी विधानसभा में नाम परिवर्तन के लिए एक प्रस्ताव पारित करना चाहिए और केंद्र सरकार उस पर अपनी मुहर लगाकर उसे संसद में पेश कर दे। मुझे नहीं लगता कि इस काम के लिए या राज्य का नाम बदलने से किसी को भी कोई आपत्ति होगी। आम बोलचाल और बातचीत में भी ‘पश्चिम बंगाल’ कहना थोड़ा अजीब सा लगता है, हम सभी की जुबान पर हमेशा सीधा ‘बंगाल’ ही आता है। तो आधिकारिक तौर पर भी यही नाम क्यों न हो? ‘पश्चिम बंगाल’ को केवल ‘बंगाल’ पुकारना कितना बढ़िया और स्वाभाविक लगेगा।
West Bengal Election 2026
इसी साल हमने देखा है कि कैसे केरल का नाम बदलकर आधिकारिक रूप से ‘केरलम्’ किया गया। हालांकि उसकी प्रक्रिया जून 2024 से शुरू हो गई थी और उसमें थोड़ा वक्त लगा। लेकिन बंगाल के मामले में इतना ज्यादा वक्त बिल्कुल नहीं लगना चाहिए। आखिर अब राज्य में भी बीजेपी की पूर्ण बहुमत की सरकार बन रही है और केंद्र में तो बीजेपी है ही। यानी डबल इंजन की सरकार में फाइलों को दौड़ने में कोई अड़चन नहीं आनी चाहिए।
नई सरकार को मेरी तरफ से बहुत-बहुत शुभकामनाएं। उम्मीद है कि विकास, रोजगार और ‘पोरिबर्तोन’ के साथ-साथ राज्य की इस पहचान को भी वो जल्द दुरुस्त करेंगे और यह काम पहली फुर्सत में हो जाएगा।
सूबे के नाम बदलने के लिए पहले भी कवायद होती रही है । लेकिन इसमें कामयाबी नहीं मिली । 1999, 2011 में कोशिश की गई लेकिन नहीं हो पाया । उसके बाद 2016 और 2018 में भी विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर केन्द्र को भेजा गया , लेकिन केन्द्र इसे खारिज कर दिया । केन्द्र में 2014 से बीजेपी सरकार है ।
2016 में विधासनभा के प्रस्ताव , जिसके तहत अंग्रेजी में ‘Bengal’, बंगाली में ‘Bangla’ और हिंदी में ‘Bangal’ नाम करने की मांग की गई थी। केंद्र ने 2017 में इस तीन नामों वाले प्रस्ताव को यह कहकर खारिज कर दिया कि तीन भाषाओं के लिए तीन अलग नाम नहीं रखे जा सकते। 2018 में केंद्र सरकार ने ‘बांग्ला’ नाम को इसलिए नामंजूर कर दिया क्योंकि यह नाम पड़ोसी देश ‘बांग्लादेश’ से काफी मिलता-जुलता है। केंद्र का मानना था कि अंतरराष्ट्रीय आयोजनों या मंचों पर दोनों के नामों में भ्रम (confusion) पैदा हो सकता है। केंद्र की मंजूरी न मिलने के कारण राज्य के नाम में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
तो दो बार बीजेपी शासित केन्द्र सरकार के पास प्रस्ताव पहुंचे लेकिन मंजूरी नहीं मिली । इशके पीछे श्रेय की राजनीति भी हो सकती है, क्योंकि पिछली दो बार में से बंगाल में तृणमुल कांग्रेस की सरकार थी, लेकिन अब 2026 में केन्द्र और राज्य दोनों जगह बीजेपी सरकार है तो हो सकता है , इस पर विचार भी किया जाए और ये काम हो भी जाए । बाकी तो जो है सो है ही ।
– वीरेन्द्र सिंह राठौर
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