लोकतंत्र का महाउत्सव हो और चुनावी वादों की बात न हो, ऐसा कैसे हो सकता है। चुनाव आयोग भले ही लाख हिदायतें दे कि चुनावों में किसी तरह का प्रलोभन या लालच नहीं चलेगा और अगर कुछ वादे करने भी हैं तो उन्हें चुनावी घोषणा पत्र के जरिए बाकायदा जनता के सामने रखिए। हमारी राजनीति में एक आम धारणा यह भी मानी जाती है कि चुनावी प्रलोभनों या मुफ्त की ‘रेवड़ियों’ के जाल में पढ़े-लिखे और शिक्षित लोग कम फंसते हैं। लेकिन दक्षिण के राज्य तमिलनाडु के ताज़ा चुनावी नतीजों ने इस धारणा को भी पूरी तरह से पलट कर रख दिया है। वहां अब चुनाव सिर्फ टीवी या पंखे जैसी रेवड़ियां बांटने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बात सीधे ‘सोना’ बांटने तक पहुंच गई है।

तमिलनाडु में जाने-माने अभिनेता विजय और उनकी पार्टी ‘टीवीके’ (TVK) की जीत पहली नजर में अप्रत्याशित जरूर लग सकती है, लेकिन जमीनी हकीकत और चुनावी आंकड़ों को देखकर यह साफ कहा जा सकता है कि जनता ने उनकी लुभावनी घोषणाओं पर भरपूर भरोसा किया है। इस चुनाव में उनकी सबसे बड़ी और अचूक घोषणा थी- गरीब परिवार की लड़कियों की शादी में 8 ग्राम सोना और सिल्क की साड़ी देना, साथ ही बच्चे के जन्म पर सोने की अंगूठी देना। इसके अलावा युवाओं, महिलाओं और बेरोजगारों के लिए भत्ते की जो घोषणाएं हुईं, उन्होंने भी अपना काम बखूबी किया और वोटरों को अपनी तरफ खींच लिया।
वैसे देखा जाए तो तमिलनाडु को मुफ्त की रेवड़ी बांटने का सबसे बड़ा और पुराना गढ़ कहा जा सकता है। यहां के चुनावों का इतिहास ही कभी टीवी, कभी मिक्सर तो कभी पंखे बांटने की घोषणाओं से भरा पड़ा है। करुणानिधि ने चुनाव में कलर टीवी देने का वादा किया और जनता ने उन्हें जिता दिया। फिर जयललिता ने पंखे और मिक्सर बांटने की बात कही, तो जनता ने उन्हें भी सिर आंखों पर बिठा लिया और वो चुनाव जीत गईं।
इस बार भी चुनावों में वादों का केंद्र घरेलू सामग्री ही रहा। किसी ने फ्रिज देने की बात कही, तो निवर्तमान सीएम ने महिलाओं के लिए 8 हजार रुपये के कूपन की घोषणा कर दी, ताकि महिला मतदाता अपनी पसंद का कोई भी इलेक्ट्रॉनिक घरेलू उपकरण खरीद सकें। लेकिन इस बार तमिलनाडु की जनता को सबसे ज्यादा भाया विजय का ‘सोना’। आज के समय में जब सोने के भाव आसमान छू रहे हैं, ऐसे में शादी पर 8 ग्राम सोना और बच्चे के जन्म पर सोने की अंगूठी की गारंटी… भला कौन ऐसा होगा जो इसे ठुकराना चाहेगा!
अब इस पूरी तस्वीर का सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला आंकड़ा आपको बताता चलूं। तमिलनाडु कोई पिछड़ा राज्य नहीं है; यहां की साक्षरता दर 80 प्रतिशत के करीब है। आर्थिक मोर्चे पर भी यह राज्य देश की जीडीपी में 8 प्रतिशत से ज्यादा का मजबूत योगदान देता है। यानी एक तरफ उच्च शिक्षा और देश की मजबूत अर्थव्यवस्था वाला ढांचा है, तो दूसरी तरफ चुनावी रेवड़ियों के प्रति इतना भारी आकर्षण। यह विरोधाभास हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक ऐसी हकीकत है जो सोचने पर मजबूर करती है कि क्या वाकई शिक्षा चुनावी प्रलोभनों को हरा सकती है?
बाकी तो जो दिख रहा है, वो भी सही है।
– वीरेन्द्र सिंह राठौर

